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धराली आपदा का रहस्य: क्या बदल रहा है हिमालय में बादल फटने का पैटर्न?

नई दिल्ली। उत्तरकाशी जिले के धराली गांव में 5 अगस्त 2025 को आई अचानक बाढ़ और मलबे की तबाही ने वैज्ञानिकों और मौसम विशेषज्ञों को चौंका दिया है। समुद्र तल से 2,745 मीटर की ऊंचाई पर बसे इस गांव में कुछ ही मिनटों में सब कुछ तहस-नहस हो गया। इस घटना को शुरुआत में बादल फटने से जोड़ा गया, लेकिन बाद में भारतीय मौसम विभाग के आंकड़ों और रिपोर्ट ने यह दावा खारिज कर दिया।दरअसल, उस समय धराली के आसपास किसी भी मौसम केंद्र ने बादल फटने जैसी तीव्र वर्षा दर्ज नहीं की थी। विशेषज्ञों का मानना है कि यह घटना 3,000 मीटर से अधिक ऊंचाई पर हुई भारी बारिश का परिणाम हो सकती है, जहां मौसम स्टेशनों की पहुंच नहीं है। वहां हुई बारिश नीचे की ओर बहकर बाढ़ और भूस्खलन का कारण बनी।

जलवायु परिवर्तन का असर? – विशेषज्ञों के मुताबिक, धराली जैसी आपदाएं हिमालयी क्षेत्रों में बदलते जलवायु पैटर्न का संकेत हैं। पहाड़ अब पहले से ज्यादा तेजी से गर्म हो रहे हैं — वैश्विक औसत से 25-50 प्रतिशत तेज। इसका असर बारिश के स्वरूप पर भी पड़ रहा है। पहले जहां ऊंचे इलाकों में बर्फबारी होती थी, अब वहां भी तेज बारिश देखने को मिल रही है। इससे अचानक बाढ़, भूस्खलन और मलबे की घटनाएं बढ़ रही हैं। एक अनुमान के अनुसार, हर 1 डिग्री सेल्सियस तापमान वृद्धि से ऊंचे इलाकों में वर्षा 15 प्रतिशत तक बढ़ सकती है। साथ ही, ग्लेशियर तेजी से पिघल रहे हैं, जिससे हिमनदीय झीलों के फटने (ग्लोफ) का खतरा भी बढ़ता जा रहा है।

क्या किया जा सकता है? – विशेषज्ञों ने चेताया है कि धराली जैसी आपदाएं भविष्य में और गंभीर हो सकती हैं, अगर समय रहते जरूरी कदम नहीं उठाए गए। इनके समाधान के लिए सुझाव दिए गए हैं। इनके अनुसार ऊंचाई वाले क्षेत्रों में ऑटोमैटिक वेदर स्टेशन और सैटेलाइट आधारित मॉनिटरिंग सिस्टम लगाया जाना चाहिए। ग्लेशियर व हिमनदीय झीलों की निगरानी बढ़ाना चाहिए। निर्माण कार्यों में भूकंपीय सुरक्षा और पर्यावरणीय संतुलन का ध्यान रखना चाहिए। जंगलों का संरक्षण करना ताकि भूस्खलन और कटाव रोका जा सके औरस्थानीय समुदायों को आपदा प्रबंधन की ट्रेनिंग दी जानी चाहिए।धराली की त्रासदी महज एक स्थानीय घटना नहीं, बल्कि एक चेतावनी है, कि जलवायु परिवर्तन अब हमारे पहाड़ों की भौगोलिक संरचना और जीवनशैली को बदल रहा है। अब वक्त आ गया है कि हम वैज्ञानिक निगरानी, टिकाऊ विकास और स्थानीय जागरूकता को प्राथमिकता दें, ताकि आने वाले समय में ऐसी आपदाओं से जान-माल की हानि रोकी जा सके।

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