नई दिल्ली। महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (मनरेगा) के स्थान पर प्रस्तावित विकसित भारत-रोजगार एवं आजीविका मिशन (ग्रामीण) यानी वीबी जी-रामजी योजना को लेकर कांग्रेस ने केंद्र सरकार पर तीखा हमला बोला है। पार्टी का आरोप है कि नई व्यवस्था से राज्यों पर अतिरिक्त वित्तीय बोझ पड़ेगा और इससे देश के संघीय ढांचे पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है।कांग्रेस महासचिव जयराम रमेश ने सोमवार को सोशल मीडिया मंच एक्स पर जारी बयान में कहा कि मनरेगा एक मांग-आधारित और अधिकार-आधारित रोजगार गारंटी योजना थी, जबकि नई व्यवस्था आवंटन-आधारित योजना के रूप में काम करेगी।
उनके अनुसार प्रस्तावित मॉडल में कुल व्यय का 60 प्रतिशत हिस्सा केंद्र सरकार वहन करेगी, जबकि शेष 40 प्रतिशत खर्च राज्यों को उठाना होगा। जयराम रमेश ने कहा कि जिस आवंटन फार्मूले को अपनाया जा रहा है, वहीं 16वें वित्त आयोग द्वारा राज्यों के बीच करों के बंटवारे के लिए इस्तेमाल किया गया था। उनका तर्क है कि यह फार्मूला राजस्व वितरण के लिए उपयुक्त हो सकता है, लेकिन व्यय वहन करने के लिए नहीं। उन्होंने कहा कि अनुदान व्यवस्था में कटौती और राज्यों पर अतिरिक्त जिम्मेदारी डालने से पहले से ही कमजोर संघीय ढांचे पर दबाव बढ़ेगा।
कांग्रेस नेता ने आरोप लगाया कि केंद्र सरकार ने ग्रामीण विकास संबंधी संसदीय स्थायी समिति, राज्य सरकारों और अन्य हितधारकों से व्यापक चर्चा किए बिना ही मनरेगा को समाप्त करने संबंधी विधेयक संसद से पारित कराया।
उन्होंने इसे राजनीतिक प्रतिशोध और जल्दबाजी में लिया गया निर्णय बताया। जयराम रमेश ने दावा किया कि कई राज्यों ने भी नई योजना को लेकर गंभीर आपत्तियां जताई हैं। उनके अनुसार मध्यप्रदेश, बिहार और उत्तराखंड जैसे भाजपा शासित राज्यों ने भी अतिरिक्त वित्तीय भार को लेकर चिंता व्यक्त की है। वहीं कुछ राज्यों ने कृषि सीजन के दौरान प्रस्तावित ‘ब्लैकआउट अवधि’ का विरोध किया है, जिसमें योजना के तहत काम उपलब्ध नहीं कराया जाएगा। उन्होंने यह भी कहा कि कम से कम पांच राज्यों ने ग्रामीण श्रमिकों की मजदूरी दर बढ़ाने की मांग की है। कांग्रेस का कहना है कि नई योजना के प्रभाव और उसके क्रियान्वयन को लेकर राज्यों की आशंकाओं पर गंभीरता से विचार किया जाना चाहिए।



