HomeNationalकम मानसूनी बारिश के बाद सूखे का खतरा: किसानों और लोगों को...

कम मानसूनी बारिश के बाद सूखे का खतरा: किसानों और लोगों को क्या मिलेगी राहत?

नई दिल्ली । देश में इस साल का मानसून सीजन तकनीकी रूप से समाप्त हुआ है, और मानसून आंकड़ों के अनुसार, जून से सितंबर के बीच पूरे देश में औसतन सामान्य से करीब 13 प्रतिशत कम बारिश दर्ज की गई है। इस कमी का सबसे अधिक असर पूर्वी और पूर्वोत्तर भारत में देखने को मिला, जहाँ बारिश सामान्य से करीब 25 प्रतिशत कम रही। इसी तरह, दक्षिण प्रायद्वीप में भी करीब 24 प्रतिशत की कमी दर्ज की गई है, जिससे कई इलाकों में सूखे जैसी परिस्थितियाँ बनने की आशंका गहरा गई है।हालांकि, इन आंकड़ों के बावजूद, यह समझना महत्वपूर्ण है कि पूरे देश को एक साथ सूखा प्रभावित घोषित किया जाएगा, ऐसा जरूरी नहीं है।

सूखे का आकलन केवल कुल मानसूनी बारिश के आधार पर नहीं किया जाता। किसी क्षेत्र में कितनी बारिश हुई है, फसलों की वर्तमान स्थिति कैसी है, मिट्टी में नमी का स्तर क्या है, जलाशयों और भूजल की स्थिति कैसी है, और सबसे महत्वपूर्ण, खेती पर इसका कितना समग्र असर पड़ा है – इन सभी पहलुओं का बारीकी से विश्लेषण करने के बाद किया जाता है। इसकारण देशभर में 13 प्रतिशत कम बारिश होने का मतलब यह नहीं है कि केंद्र सरकार पूरे भारत को सूखा प्रभावित घोषित करेगी। इसके बजाय, राज्य सरकारें अपने-अपने क्षेत्रों की स्थिति का गहन आकलन कर प्रभावित जिलों या विशिष्ट इलाकों को सूखा प्रभावित घोषित करने का निर्णय ले सकती हैं।बारिश की कमी का असर खेती-किसानी पर भी पड़ना तय है। पंजाब और दक्षिण भारत के कुछ हिस्सों में पानी की कमी से कृषि प्रभावित होने की स्थिति बन रही है। हालांकि, दक्षिण भारत के लिए अक्टूबर से दिसंबर के बीच होने वाली उत्तर-पूर्वी मानसूनी बारिश महत्वपूर्ण राहत दे सकती है।

दक्षिण प्रायद्वीपीय भारत में सालभर होने वाली बारिश का करीब 30 प्रतिशत हिस्सा इसी मानसून से आता है, जबकि तमिलनाडु और पुडुचेरी में यह हिस्सेदारी करीब 48 प्रतिशत तक पहुँच जाती है। इसके बाद आने वाले महीनों की यह बारिश इन क्षेत्रों के लिए बेहद महत्वपूर्ण है।यदि किसी राज्य या जिले को आधिकारिक तौर पर सूखा प्रभावित घोषित होता है, तब किसानों और ग्रामीण आबादी को राहत पहुँचाने के लिए विभिन्न उपाय हो सकते हैं। फसल खराब होने की स्थिति में किसानों को सीधे आर्थिक राहत या कृषि इनपुट सहायता दी जा सकती है। जिन किसानों ने फसल बीमा कराया है, उनके लिए नुकसान के आकलन के आधार पर बीमा दावों का निपटान महत्वपूर्ण होगा।

प्रभावित क्षेत्रों में पीने के पानी की उपलब्धता सुनिश्चित करने के साथ-साथ पशुपालकों के लिए चारे और पानी की व्यवस्था की जा सकती है। सूखे की स्थिति में ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार की मांग बढ़ जाती है, इस देखकर ग्रामीण रोजगार योजनाओं के माध्यम से लोगों को रोजगार और मजदूरी उपलब्ध कराने पर जोर हो सकता है। राज्य सरकारें अपने उपलब्ध आपदा राहत संसाधनों से सहायता प्रदान कर सकती हैं और नियमों के अनुसार केंद्र सरकार से भी वित्तीय मदद की मांग कर सकती हैं। यह समझना आवश्यक है कि सूखा घोषित होने पर हर किसान को अपने-आप कोई निश्चित रकम मिल जाए, ऐसा कोई स्वचालित प्रावधान नहीं है। राहत की मात्रा और उसका स्वरूप प्रभावित क्षेत्र, वास्तविक नुकसान और लागू सरकारी योजनाओं पर ही निर्भर करेगा।

RELATED ARTICLES

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

- Advertisment -
Google search engine

Most Popular

Recent Comments