उन्होंने चिंता व्यक्त की कि वैश्विक तापमान में वृद्धि के कारण भीषण बाढ़, गंभीर सूखे और समुद्री सुनामी जैसी आपदाओं का खतरा बढ़ गया है। मौसम में हो रहे असंतुलन का सीधा प्रभाव मनुष्य, पशु-पक्षियों, जलीय जीवों और वनस्पतियों पर पड़ रहा है। उन्होंने कहा कि ये सभी हालात मानव द्वारा प्रकृति के साथ की गई छेड़छाड़ का परिणाम हैं।संत सीचेवाल ने ज़ोर देकर कहा कि यदि आने वाली पीढ़ियों को सुरक्षित भविष्य देना है, तो पर्यावरण संरक्षण की सोच को प्राथमिक स्तर के स्कूलों से ही विकसित करना होगा। यदि बच्चों को शुरू से ही प्रकृति से प्रेम करना, उसकी कद्र करना और उसकी रक्षा करना सिखाया जाए, तो यही बच्चे भविष्य में समाज की सबसे बड़ी ताकत बनकर उभरेंगे।
उन्होंने कहा कि “थिंक ग्लोबली, एक्ट लोकली” का सिद्धांत तभी सफल हो सकता है जब पर्यावरण शिक्षा केवल पुस्तकों तक सीमित न रहे, बल्कि उसे ज़मीनी स्तर पर लागू किया जाए। पाठ्यक्रम में वृक्षारोपण, पौधों की देखभाल, जल संरक्षण, कचरा प्रबंधन और प्रकृति के साथ सामंजस्यपूर्ण जीवन जीने की व्यावहारिक शिक्षा को शामिल किया जाना चाहिए। अंत में उन्होंने केंद्र सरकार से अपील की कि देश के सभी स्कूलों में पर्यावरण विषय को अनिवार्य घोषित कर एक ऐसे जागरूक समाज का निर्माण किया जाए, जो धरती माता की रक्षा कर सके और आने वाली पीढ़ियों के लिए सुरक्षित भविष्य सुनिश्चित कर सके।



