चंडीगढ़ : राज्यसभा के शून्यकाल के दौरान राज्यसभा सांसद पद्मश्री राजिंदर गुप्ता ने देश की सार्वजनिक शिक्षा व्यवस्था की गंभीर स्थिति पर चिंता जताते हुए इसे सशक्त बनाने के लिए मिशन मोड में सुधारों की आवश्यकता पर बल दिया। सभापति की अनुमति से बोलते हुए उन्होंने कहा कि सरकारी स्कूलों में फिर से विश्वास, गरिमा और समान अवसर बहाल करना समय की मांग है। अपने संबोधन की शुरुआत करते हुए गुप्ता ने डॉ. भीमराव आंबेडकर के शब्दों का उल्लेख करते हुए कहा कि “राजनीतिक लोकतंत्र तब तक टिक नहीं सकता, जब तक उसकी नींव में सामाजिक लोकतंत्र न हो,” और सामाजिक लोकतंत्र की नींव आम और समान शिक्षा है।
उन्होंने हाल ही में प्रस्तुत आर्थिक सर्वेक्षण 2025–26 का हवाला देते हुए कहा कि भारत दुनिया की सबसे बड़ी स्कूली शिक्षा प्रणालियों में से एक है, जिसमें लगभग 15 लाख स्कूल, जिनमें करीब 25 करोड़ विद्यार्थी और एक करोड़ से अधिक शिक्षक शामिल हैं, इसके बावजूद सीखने के ठोस परिणाम सामने नहीं आ पा रहे हैं।आर्थिक सर्वेक्षण के आंकड़ों का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि देश के 54 प्रतिशत स्कूल केवल प्रारंभिक और बुनियादी शिक्षा तक सीमित हैं, जबकि ग्रामीण भारत में मात्र 17 प्रतिशत स्कूलों में ही माध्यमिक शिक्षा की सुविधा उपलब्ध है। यह स्थिति प्राथमिक स्तर के बाद आगे की शिक्षा तक पहुंच में गंभीर असमानता को दर्शाती है। उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि कई बार नीति निर्माता और अधिकारी स्वयं अपने बच्चों को सरकारी स्कूलों में नहीं पढ़ाते, जो सार्वजनिक संस्थानों पर भरोसे के कमजोर पड़ने का संकेत है।
निजी स्कूलों की बढ़ती फीस पर चिंता जताते हुए गुप्ता ने कहा कि निजी स्कूलों में फीस में हर साल 10 से 15 प्रतिशत तक की वृद्धि हो रही है, जिससे मध्यमवर्गीय और गरीब परिवार कर्ज के बोझ तले दबते जा रहे हैं। वहीं, कोचिंग उद्योग आज लगभग 58 हजार करोड़ रुपये के बाजार में तब्दील हो चुका है, जो शिक्षा में बढ़ती असमानता को और गहरा कर रहा है। उन्होंने शिक्षा बजट में 8.2 प्रतिशत की वृद्धि कर इसे रिकॉर्ड 1.39 लाख करोड़ रुपये तक पहुंचाने के लिए वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण की सराहना की, लेकिन साथ ही यह भी कहा कि इसके बावजूद शिक्षा पर कुल सार्वजनिक खर्च अब भी राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 में सुझाए गए जीडीपी के 6 प्रतिशत के लक्ष्य से काफी नीचे है।
राज्यसभा सांसद ने मांग की कि सार्वजनिक शिक्षा को मिशन मोड में मजबूत किया जाए, सरकारी स्कूलों में गुणवत्ता और उत्कृष्टता लौटाई जाए तथा यह सुनिश्चित किया जाए कि हर बच्चा, चाहे उसका जन्म किसी भी पृष्ठभूमि में हुआ हो, समान शैक्षिक आधार के साथ जीवन की शुरुआत कर सके।अपने सुझावों में उन्होंने जीएसटी काउंसिल की तर्ज पर एक “नेशनल स्कूल फीस कौंसिल” के गठन का प्रस्ताव भी रखा, जिसमें केंद्र और राज्य मिलकर स्कूलों की फीस के लिए पारदर्शी और न्यायसंगत मानक तय करें, साथ ही क्षेत्रीय विविधताओं का भी सम्मान हो। गुप्ता ने कहा कि देश के लोकतंत्र का भविष्य आज कक्षाओं में रखी जा रही नींव पर निर्भर करता है और इसके लिए शिक्षा को सुलभ, समान और भरोसेमंद बनाना अनिवार्य है।



