नई दिल्ली- देश में दवाओं की वास्तविक निर्माण लागत और उनके अधिकतम खुदरा मूल्य (एमआरपी) के बीच मौजूद विशाल अंतर को लेकर फिर नीतिगत और कानूनी स्तर पर बहस तेज हुई है। हाल ही में केंद्र की मोदी सरकार द्वारा कैंसर की दवाओं पर ट्रेड मार्जिन सीमित करने के फैसले से देश के मरीजों को सालाना करीब 2,500 करोड़ रुपये की बड़ी बचत होने की बात सामने आई है।केंद्र सरकार के कदम की सराहना कर सर्वोच्च न्यायालय ने एक अहम सवाल उठाया है कि जब कैंसर जैसी गंभीर बीमारी की दवाओं पर मुनाफे की सीमा तय हो सकती है, तब अन्य सामान्य, जीवनरक्षक और पुरानी बीमारियों की दवाओं पर ऐसा नियंत्रण लागू क्यों नहीं हो सकता? शीर्ष अदालत ने गंभीर विषय मानकर केंद्र सरकार को व्यापक कार्ययोजना तैयार कर 27 अक्टूबर तक अदालत के समक्ष प्रस्तुत करने का सख्त आदेश दिया है। दवाओं के मूल्य निर्धारण में चल रही मनमानी की जमीनी हकीकत हाल ही में उत्तर प्रदेश में कराए गए एक सरकारी अध्ययन में उजागर हुई।
राज्य के 214 मेडिकल कॉलेजों और अस्पतालों से संबद्ध फार्मेसियों में 130 जीवनरक्षक दवाओं का गहन विश्लेषण हुआ। जांच में सामने आया हैं कि 36 दवाओं का एमआरपी उनकी वास्तविक खरीद लागत से दस गुना से भी अधिक था। कुछ विशेष दवाओं में यह अंतर 67 गुना तक दर्ज हुआ। उदाहरण के तौर पर, बैक्टीरियल इंफेक्शन के इलाज में इस्तेमाल होने वाला पॉलीमाइक्सिन-बी इंजेक्शन अस्पताल द्वारा महज 74 रुपये में खरीदा गया था, लेकिन उस पर प्रिंट एमआरपी 4,981 रुपये दर्ज थी। इसतरह बेवाकिजुमैब नामक दवा की वास्तविक खरीद कीमत 7,541 रुपये थी, जो कि मरीजों को 69,995 रुपये के छपे मूल्य पर बेची जा रही थी।कारोबार से जुड़े विशेषज्ञों और दवा नीति के जानकारों का सुझाव है कि ट्रेड मार्जिन को कुल 30 प्रतिशत तक सीमित कर मरीजों को तत्काल वित्तीय राहत मिल सकती है, जिसमें 20 प्रतिशत खुदरा विक्रेता और 10 प्रतिशत वितरक के लिए तय हो।
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने निजी अस्पतालों द्वारा अपनी ही इन-हाउस फार्मेसी से महंगी दवाएं खरीदने के लिए मरीजों को मजबूर करने की प्रवृत्ति पर नाराजगी जाहिर की। सुप्रीम कोर्ट ने कड़े शब्दों में टिप्पणी की कि कई निजी स्वास्थ्य संस्थान अब सेवाभाव छोड़कर पूरी तरह मुनाफा कमाने में लगी हुई हैं।इसके अलावा, स्वास्थ्य क्षेत्र में पैथोलॉजी जांचों में व्यापक अनियमितताएं और डॉक्टरों द्वारा कमीशन के चक्कर में अनावश्यक लैब टेस्ट लिखने का मुद्दा सामने आया है। वर्तमान में राष्ट्रीय औषधि मूल्य निर्धारण प्राधिकरण (एनपीपीए) केवल आवश्यक दवाओं की राष्ट्रीय सूची में शामिल दवाओं के दाम नियंत्रित करता है, जबकि गैर-आवश्यक दवाओं की शुरुआती कीमत तय करने की छूट कंपनियों के पास है। संसद की स्थायी समिति ने भी सिफारिश की है कि दवाओं और चिकित्सा उपकरणों की वास्तविक लागत व एमआरपी में 20 प्रतिशत से अधिक का अंतर नहीं होना चाहिए। अब गेंद केंद्र सरकार के पाले में है कि वह अदालत के निर्देशों के अनुरूप पारदर्शी और जनहितैषी मूल्य नीति कैसे तैयार करती है।



