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ट्रेन में बम विस्फोट भी दुर्घटना है, रेलवे मुआवजा देने से नहीं बच सकता : पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट 

चंडीगढ़। पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने एक अहम टिप्पणी में कहा कि यात्री ट्रेन में हुआ बम विस्फोट भी रेलवे अधिनियम के तहत दुर्घटना माना जाएगा और ऐसी घटना में यात्रियों की मौत होने पर रेलवे प्रशासन मुआवजा देने की जिम्मेदारी से नहीं बच सकता। हाईकोर्ट ने करीब 34 साल पुराने जंता एक्सप्रेस बम विस्फोट मामले में केंद्र सरकार और रेलवे प्रशासन की अपीलों को खारिज करते हुए रेलवे क्लेम्स ट्रिब्यूनल के आदेश को बरकरार रखा है।जस्टिस पंकज जैन की पीठ ने यह फैसला 8 फरवरी 1992 को हरियाणा में टोहाना से जींद जा रही 24-डाउन जंता एक्सप्रेस में हुए बम विस्फोट से जुड़े तीन मामलों में सुनाया। इस हादसे में पांच लोगों की मौत हो गई थी और कई यात्री गंभीर रूप से घायल हुए थे, जबकि घटना के बाद विस्फोटक अधिनियम, टाडा तथा भारतीय दंड संहिता की कई धाराओं के तहत मामला दर्ज किया गया था।

मृतकों के परिजनों ने रेलवे क्लेम्स ट्रिब्यूनल में मुआवजे के लिए दावे किए थे।मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक ट्रिब्यूनल ने अपने फैसले में माना था कि ट्रेन में हुआ बम विस्फोट दुर्घटना की श्रेणी में आता है और रेलवे प्रशासन पीड़ित परिवारों को मुआवजा देने के लिए उत्तरदायी है। ट्रिब्यूनल के इस आदेश को चुनौती देते हुए केंद्र सरकार और रेलवे प्रशासन ने हाईकोर्ट में अपील की थी। अपील में रेलवे की ओर से तर्क दिया कि बम विस्फोट किसी बाहरी आपराधिक कृत्य का परिणाम था, इसलिए इसे रेलवे दुर्घटना नहीं माना जा सकता। हाईकोर्ट ने इस दलील को सिरे से खारिज कर दिया। कोर्ट ने कहा कि उत्तरी रेलवे के दुर्घटना मैनुअल में ट्रेन में आग लगने या विस्फोट जैसी घटनाओं को स्पष्ट रूप से रेल हादसों की श्रेणी में शामिल किया गया है।

पीठ ने आदेश में यह भी कहा कि सुप्रीम कोर्ट पूर्व में स्पष्ट कर चुका है कि ट्रेन में विस्फोट या उसके उड़ जाने जैसी घटनाएं ऐसी असामान्य परिस्थितियां हैं, जिनकी सामान्य यात्री यात्रा के दौरान कल्पना नहीं करता है। इसलिए इन्हें दुर्घटना की परिभाषा से बाहर नहीं रखा जा सकता। कोर्ट ने कहा कि जब रेलवे स्वयं अपने नियमों में विस्फोट और आग जैसी घटनाओं को हादसा मानता है तो वह मुआवजे की जिम्मेदारी से नहीं बच सकता। हालांकि, मृतकों के परिजनों द्वारा ज्यादा मुआवजे की मांग को कोर्ट ने स्वीकार नहीं किया। हाईकोर्ट ने कहा कि ट्रिब्यूनल का मूल अवार्ड 1993 में पारित हुआ था और उस समय तय मुआवजा राशि दो लाख रुपए थी। इसलिए उसी आधार पर भुगतान किया जाएगा। कोर्ट ने निर्देश दिया कि दावेदारों को तय मुआवजा राशि पर दावा याचिका दाखिल करने की तारीख से भुगतान होने तक नौ फीसदी वार्षिक ब्याज भी दिया जाएगा।

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