नई दिल्ली। संसद के आगामी मानसून सत्र से पहले सरकार और विपक्ष ने अपनी-अपनी तैयारियां तेज कर दी हैं। केंद्र सरकार ने सत्र शुरू होने से एक दिन पहले 19 जुलाई को सर्वदलीय बैठक बुलाई है, जिसमें विभिन्न राजनीतिक दलों के नेताओं के साथ सत्र के सुचारु संचालन और विधायी कार्यों पर चर्चा की जाएगी। दूसरी ओर, विपक्षी दलों के गठबंधन इंडिया ने भी सरकार को विभिन्न मुद्दों पर घेरने की रणनीति तैयार कर ली है।सूत्रों के अनुसार, सर्वदलीय बैठक में केंद्र सरकार मानसून सत्र के दौरान प्रस्तुत किए जाने वाले विधायी एजेंडे की रूपरेखा साझा कर सकती है। वहीं विपक्ष अपने प्रमुख राजनीतिक और जनहित से जुड़े मुद्दों को बैठक में उठाने की तैयारी कर रहा है।
मीडिया रिपोर्ट के अनुसार राष्ट्रीय जनता दल (राजद) के सांसद सुधाकर सिंह ने कहा है, कि इंडिया गठबंधन संसद में राम मंदिर चढ़ावा मामले, नीट परीक्षा से जुड़े कथित अनियमितताओं के मुद्दे और अन्य मामलों पर केंद्र सरकार से जवाब मांगेगा। उन्होंने आरोप लगाया कि भारतीय जनता पार्टी विपक्षी दलों में विभाजन कर राजनीतिक लाभ लेने का प्रयास कर रही है, जिसका विपक्ष पुरजोर विरोध करेगा। सुधाकर सिंह ने कहा कि विपक्ष एक देश, एक चुनाव, प्रस्तावित परिसीमन और उन सभी कदमों का विरोध करेगा, जिन्हें वह संविधान और लोकतांत्रिक संस्थाओं को कमजोर करने वाला मानता है। विपक्ष इन मुद्दों पर संसद के भीतर सरकार को घेरने की रणनीति बना रहा है।
इस बीच, 130वें संविधान संशोधन विधेयक की जांच कर रही संयुक्त संसदीय समिति (जेपीसी) की रिपोर्ट भी चर्चा का विषय बनी हुई है। सूत्रों के मुताबिक, समिति ने सुझाव दिया है कि यदि प्रधानमंत्री, केंद्रीय मंत्री या मुख्यमंत्री किसी गंभीर आपराधिक मामले में लगातार 30 दिनों तक न्यायिक हिरासत में रहते हैं, तो उन्हें स्थायी रूप से पद से हटाने के बजाय निलंबित किया जाए। समिति ने एक ऑटोमैटिक रिवर्सल क्लॉज का भी प्रस्ताव रखा है। इसके तहत यदि संबंधित व्यक्ति अदालत से बरी हो जाता है या निर्धारित समय के भीतर उसके खिलाफ मुकदमा आगे नहीं बढ़ता, तो उसे दोबारा पद पर बहाल किया जा सकेगा।
संसदीय समिति की रिपोर्ट में गंभीर आपराधिक अपराध की परिभाषा भी सुझाई गई है, जिसमें पांच वर्ष या उससे अधिक सजा वाले अपराधों को शामिल करने की बात कही गई है। हालांकि, इस विधेयक और समिति की सिफारिशों पर अभी अंतिम निर्णय होना बाकी है। उधर, विपक्ष के कई दल पहले ही इस संयुक्त संसदीय समिति से दूरी बना चुके हैं। उनका आरोप है कि प्रस्तावित प्रावधानों का राजनीतिक दुरुपयोग कर निर्वाचित सरकारों को अस्थिर किया जा सकता है। मानसून सत्र के दौरान इन मुद्दों पर सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच तीखी बहस होने की संभावना जताई जा रही है।



