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विपक्ष उपराष्ट्रपति चुनाव पर चर्चा करना चाहता है तो हम तैयार -किरेन रिजिजू

नई दिल्ली। उपराष्ट्रपति पद के चुनाव की कवायद शुरू हो गई है। राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) ने गुरुवार को पीएम मोदी और बीजेपी अध्यक्ष जे पी नड्डा को उपराष्ट्रपति पद के उम्मीदवार को अंतिम रूप देने अधिकृत किया है। इससे जगदीप धनखड़ के उत्तराधिकारी के सत्तारूढ़ दल से होने की संभावना बढ़ गई है। संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू ने कहा कि पीएम मोदी द्वारा लिया गया फैसला सभी एनडीए दलों द्वारा स्वीकार किया जाएगा। उन्होंने यह भी कहा कि अगर विपक्ष उपराष्ट्रपति चुनाव पर चर्चा करना चाहता है, तो वे तैयार हैं। विपक्षी इंडिया ब्लॉक ने पहले ही अपना उम्मीदवार उतारने का संकेत दे दिया है।

नए संसद भवन में गठबंधन के सदस्यों की बैठक के बाद संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू ने कहा कि उन्होंने सर्वसम्मति से पीएम मोदी और जेपी नड्डा को लोकसभा और राज्यसभा में सदन के नेता हैं, उपराष्ट्रपति पद के उम्मीदवार पर फैसला करने के लिए अधिकृत किया है। रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने बैठक की अध्यक्षता की। बैठक में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह, जेपी नड्डा और रिजिजू, जेडीयू के दिलेश्वर कामत और ललन सिंह, शिवसेना के श्रीकांत शिंदे, टीडीपी के लावू श्रीकृष्ण देवरायलू और एलजेपी के चिराग पासवान शामिल थे। बीजेपी के सहयोगी अनुप्रिया पटेल (अपना दल), उपेंद्र कुशवाहा (आरएलपी) और रामदास अठावले (आरपीआई) भी चर्चा में शामिल थे।

एनडीए उम्मीदवार की जीत तय मानी जा रही है क्योंकि 788 की अधिकतम संख्या के मुकाबले, दोनों सदनों की प्रभावी संख्या 781 है। ऐसा इसलिए है क्योंकि निचले सदन में एक और ऊपरी सदन में छह सीटें खाली हैं। इन छह सीटों में झारखंड के पूर्व सीएम शिबू सोरेन का हाल ही में हुए निधन के कारण खाली हुई सीट भी शामिल है। एनडीए की ताकत करीब 422 है, जो बहुमत के आंकड़े 391 से ज्यादा है।यह पूछे जाने पर कि क्या एनडीए अगले उपराष्ट्रपति पर आम सहमति बनाने के लिए विपक्ष से संपर्क करेगा। रिजिजू ने कहा कि कुछ परंपराएं हैं। अगर विपक्षी दल आते हैं और हमसे चर्चा करते हैं, तो हम हमेशा उनसे चर्चा करेंगे, लेकिन यह एक संवैधानिक प्रक्रिया है जिसे हमें करना है। बता दें जगदीप धनखड़ ने 21 जुलाई को उपराष्ट्रपति पद से इस्तीफा दे दिया था। यह संसद के मॉनसून सत्र का पहला दिन था। हालांकि उन्होंने स्वास्थ्य कारणों का हवाला देते हुए इस्तीफा दिया था, लेकिन माना जाता है कि सरकार के साथ उनके संबंधों में खटास आने के कारण उनका पद पर बने रहना मुश्किल हो गया था।

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