नई दिल्ली – ‘वन नेशन, वन इलेक्शन’ को लेकर वरिष्ठ अधिवक्ता एवं राज्यसभा सदस्य कपिल सिब्बल ने केंद्र सरकार और संयुक्त संसदीय समिति पर गंभीर संवैधानिक सवाल उठाए हैं। सिब्बल ने प्रस्तावित उस कार्यक्रम पर आपत्ति जताई, जिसमें वन नेशन-वन इलेक्शन से जुड़े विधेयकों पर संसदीय समिति की सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश और अन्य न्यायाधीशों के साथ अनौपचारिक चर्चा प्रस्तावित थी।सिब्बल का कहना है कि संसद कानून बनाती है और कानून की संवैधानिक वैधता पर फैसला न्यायपालिका करती है। ऐसे में किसी प्रस्तावित कानून को संसद में अंतिम रूप दिए जाने से पहले उसी सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीशों के सामने उसकी व्याख्या या चर्चा करना, भविष्य में शक्तियों के पृथक्करण के सिद्धांत पर गंभीर सवाल खड़े कर सकता है। उन्होंने इसे भारतीय संवैधानिक इतिहास में असाधारण कदम बताते हुए कहा कि ऐसा उदाहरण उन्होंने पहले कभी नहीं देखा।
उनका तर्क है कि ‘वन नेशन, वन इलेक्शन’ से जुड़े संविधान संशोधन भविष्य में न्यायिक चुनौती का विषय बन सकते हैं। ऐसी स्थिति में यदि संबंधित न्यायाधीश पहले ही विधेयक पर अनौपचारिक चर्चा कर चुके हों तो न्यायिक निष्पक्षता को लेकर सवाल उठ सकते हैं। सिब्बल ने इसे संविधान की मूल भावना और न्यायपालिका की स्वतंत्रता से जोड़ते हुए कड़ी आपत्ति दर्ज की।विवाद बढ़ने के बाद सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीशों ने संसदीय समिति के साथ प्रस्तावित बातचीत से दूरी बना ली। रिपोर्टों के अनुसार न्यायपालिका ने संकेत दिया कि विधेयक भविष्य में न्यायिक समीक्षा के दायरे में आ सकता है, इसलिए ऐसी बातचीत उचित नहीं होगी। इसके बाद समिति का 6 अक्टूबर का प्रस्तावित सुप्रीम कोर्ट दौरा भी स्थगित/रद्द कर दिया गया।‘वन नेशन, वन इलेक्शन’ के प्रस्ताव का उद्देश्य लोकसभा और राज्य विधानसभाओं के चुनावों को एक साथ कराना है। इसके लिए संविधान में महत्वपूर्ण संशोधन प्रस्तावित हैं, जिन पर संसद में व्यापक राजनीतिक और संवैधानिक बहस जारी है।



