लखनऊ। उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव को लेकर समाजवादी पार्टी (सपा) और कांग्रेस के बीच गठबंधन में सीटों के बंटवारे का मुद्दा अहम होता जा रहा है। दोनों दलों के बीच सीटों की संख्या को लेकर सहमति बनाना आसान नहीं दिख रहा है। कांग्रेस जहां अधिक सीटों पर चुनाव लड़कर प्रदेश में अपनी राजनीतिक जमीन मजबूत करना चाहती है, वहीं सपा गठबंधन में अपने नेतृत्व और चुनावी रणनीति को प्राथमिकता देना चाहती है। इसके बाद सीटों के बंटवारे पर बातचीत चुनावी प्रदर्शन और जीत की संभावनाओं के आधार पर आगे बढ़ने की उम्मीद है।चर्चाओं के मुताबिक, कांग्रेस पहले 150 से कम सीटों पर चुनाव नहीं लड़ने की बात कर रही थी, लेकिन अब उसकी दावेदारी 200 सीटों तक पहुंच गई है।
दूसरी ओर, सपा अपने आकलन के आधार पर करीब 60 से 65 सीटों से बातचीत शुरू करने की तैयारी में है। हालांकि, सीट बंटवारे को लेकर दोनों दलों के बीच अंतिम सहमति सामने आना बाकी है।सपा अध्यक्ष और पूर्व सीएम अखिलेश यादव पहले ही कह चुके हैं कि गठबंधन में सीटों की संख्या से ज्यादा महत्व जीत की संभावना का है। इसी आधार पर दोनों दलों के संगठन की सक्रियता, स्थानीय नेतृत्व, संभावित प्रत्याशियों और सामाजिक समीकरणों का आकलन किया जा सकता है। बीते चुनावों के नतीजे भी बातचीत में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे।वर्ष 2022 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने 399 सीटों पर उम्मीदवार उतारे थे, लेकिन केवल दो सीटों पर जीत मिली थी। सपा के लिए यह प्रदर्शन कांग्रेस की अधिक सीटों की मांग पर सवाल उठाने का आधार बन सकता है। वहीं, कांग्रेस वर्ष 2024 के लोकसभा चुनाव के नतीजों को अपनी दावेदारी के समर्थन में रख सकती है। उस चुनाव में सपा ने 37 और कांग्रेस ने छह लोकसभा सीटों पर जीत दर्ज की थी।
विधानसभा क्षेत्रों के लिहाज से सपा को 183 और कांग्रेस को 39 क्षेत्रों में बढ़त मिली थी। सपा से जुड़े सूत्रों के मुताबिक, पार्टी ने प्रदेश की सभी विधानसभा सीटों का आकलन किया है। इस आकलन में पिछली जीत के साथ संभावित प्रदर्शन को शामिल किया गया है। पार्टी को उम्मीद है कि बड़ी संख्या में सीटों पर उसकी स्थिति मजबूत रह सकती है।हालांकि, सपा के सामने अपने लोकल नेताओं और टिकट के दावेदारों को संतुष्ट रखने की चुनौती भी होगी। जिन क्षेत्रों में पार्टी नेताओं को टिकट मिलने की उम्मीद है, वहां सीट कांग्रेस के खाते में जाने से असंतोष पैदा हो सकता है। दूसरी ओर, कांग्रेस को कम सीटें मिलने पर उसके कार्यकर्ताओं में गठबंधन में सीमित भूमिका का संदेश जाने की आशंका है। इसके बाद दोनों दलों के लिए सीटों की अदला-बदली, प्रत्याशियों की स्वीकार्यता और जीत की संभावना के बीच संतुलन बनाना महत्वपूर्ण होगा।



