नई दिल्ली। देश के इतिहास के सबसे लंबे चलने वाले कानूनी मामलों में से एक का अंत हो गया है। सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में हरिद्वार के नरसीपुर कलां गांव से जुड़े एक अनोखे और 70 साल पुराने जमीन विवाद का निपटारा कर दिया है। यह विवाद इतना पुराना है कि जिसने भी इस पर अंतिम फैसला सुनाया, वे दोनों जज तो तब पैदा भी नहीं हुए थे, जब यह कानूनी दांव-पेच शुरू हुआ था। इस ऐतिहासिक फैसले ने एक परिवार की चार पीढ़ियों द्वारा लड़ी जा रही कानूनी लड़ाई को विराम दे दिया है, जो देश के सभी पूर्व प्रधानमंत्रियों के कार्यकाल से होकर गुजरी है।
रिपोर्ट के अनुसार, यह विवाद 4 जून 1957 को हरिद्वार के नरसीपुर कलां गांव में 15.5 बीघा जमीन की खरीद से जुड़ा है। इस जमीन को अपीलकर्ता शराफत अली के पूर्वजों ने खरीदा था, जो उस समय नाबालिग थे। इसलिए जमीन की यह खरीद उनके पिता ने की थी। शुरुआत में यह मामला दाखिल-खारिज (म्यूटेशन) की कार्यवाही के रूप में शुरू हुआ, जो बाद में यूपी जमींदारी उन्मूलन और भूमि सुधार अधिनियम, 1950 और चकबंदी ढांचे (कंसोलिडेशन फ्रेमवर्क) के दायरे में चला गया और इसकी जटिलता बढ़ती गई। इस मामले का सफर इतना लंबा और घुमावदार रहा कि इस दौरान एक के बाद एक पीढ़ियां गुजर गईं। मूल खरीदार के साथ-साथ अपीलकर्ता शराफत अली का भी इस मुकदमेबाजी के दौरान निधन हो गया, जिसके बाद उनके कानूनी उत्तराधिकारियों ने इस लड़ाई को सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचाया। इस प्रकार, एक ही परिवार की चार पीढ़ियां इस 70 साल पुरानी मुकदमेबाजी में उलझी रहीं, जो अब आखिरकार एक निर्णायक मोड़ पर पहुंची है।
सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा और जस्टिस एन.वी. अंजारिया की बेंच ने इस मामले पर सुनवाई करते हुए एक अहम फैसला सुनाया। इससे पहले निचली अदालत (ट्रायल कोर्ट) और हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा था कि अपीलकर्ता इस सेल डीड के निष्पादन को साबित करने में विफल रहे हैं। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने निचली अदालत और हाईकोर्ट दोनों के निष्कर्षों को खारिज कर दिया और सेल डीड को वैध माना, जिससे अपीलकर्ताओं के पक्ष में एक महत्वपूर्ण जीत हुई। जमीन की खरीद के बाद जब खरीदार के नाम पर दाखिल-खारिज (म्यूटेशन) का समय आया, तो बेचने वाले ने शुरुआत में आपत्ति जताई। हालांकि, बाद में उसने अपनी आपत्ति वापस ले ली ताकि राजस्व अधिकारी अपीलकर्ताओं के पक्ष में जमीन का म्यूटेशन कर सकें।
लेकिन कहानी में नया मोड़ तब आया जब गांव में चकबंदी की प्रक्रिया शुरू हुई। अपीलकर्ताओं ने पाया कि खरीदी गई जमीन के मालिक के रूप में उनका नाम रिकॉर्ड से गायब था और वह अभी भी बेचने वाले के नाम पर ही दर्ज थी। चकबंदी अधिकारी ने म्यूटेशन रिकॉर्ड के आधार पर अपीलकर्ताओं का नाम जमीन के मालिक के रूप में दर्ज कर दिया। लेकिन बेचने वालों ने इसे फिर से चुनौती दी, जिसके बाद चकबंदी अधिकारी ने नए सिरे से फैसला करने का आदेश दिया था। आखिरकार, इतने सालों की लंबी जद्दोजहद के बाद, अब 70 साल बाद सुप्रीम कोर्ट से इस मामले का अंतिम और निर्णायक समाधान हो गया है, जिसने न्याय की धीमी गति और उसके धैर्यपूर्ण इंतजार की एक नई मिसाल पेश की है।



