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अगर मैच का अंपायर ही पक्षपाती हो, तो फिर खेलने का क्या मतलब?- सचिन पायलट

पायलट ने चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार पर पक्षपात करने का लगाया आरोप

नई दिल्ली – दिल्ली के रामलीला मैदान में 1 नवंबर को इंडिया गठबंधन की रैली को लेकर कांग्रेस नेता सचिन पायलट ने एक बड़ा बयान दिया है। उन्होंने आरोप लगाया है कि मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार ने पक्षपात किया है और भारतीय चुनाव आयोग की निष्पक्षता को खतरे में डाल दिया है। पायलट ने कहा कि आज चुनावी संस्थाओं की निष्पक्षता और स्वतंत्रता पर गंभीर सवाल उठ रहे हैं, जिसके जवाब में कांग्रेस ईसीआई के खिलाफ जन महाभियोग लाने की तैयारी कर रही है। पायलट का मानना है कि एक कार्यशील लोकतंत्र में जनता का इन संस्थाओं पर भरोसा बना रहना और उसे मजबूत करना बहुत जरुरी है।

पायलट ने मतदाता सूची से 13.3 करोड़ लोगों के नाम हटाए जाने पर भी अपनी गहरी चिंता जताई। उन्होंने तल्ख टिप्पणी करते हुए कहा कि अगर मैच का अंपायर ही पक्षपाती हो, तो फिर खेलने का क्या मतलब है? उन्होंने जनता के संस्थाओं में भरोसे पर जोर दिया। उनका कहना था कि जब स्वयं सिस्टम की निष्पक्षता पर ही शक हो, तो चुनावों में निष्पक्षता कैसे संभव है? पायलट ने कहा कि ज्ञानेश कुमार द्वारा की गई गलतियां अब पुख्ता सबूतों से साबित हो चुकी हैं, जिसके कारण उनके खिलाफ जन महाभियोग प्रक्रिया जरुरी है। उन्होंने सरकार पर संसद में विपक्ष द्वारा उठाए गए सवालों का जवाब देने में विफल रहने का आरोप लगाते हुएकहा कि इससे इन मुद्दों को सार्वजनिक मंच पर उठाना जरुरत हो गया है। पायलट ने मुख्य चुनाव आयुक्त की नियुक्ति प्रक्रिया पर भी गंभीर सवाल उठाए। उन्होंने बताया कि पहले की चयन प्रक्रिया में प्रधानमंत्री, विपक्ष के नेता और भारत के मुख्य न्यायाधीश शामिल होते थे।

उन्होंने उस नए कानून पर आपत्ति जताई जो सीईसी को पद छोडऩे के बाद भी जीवन भर के लिए सुरक्षा प्रदान करता है। पायलट ने तर्क दिया कि अब मुख्य चुनाव आयुक्त देश के ऐसे इकलौते व्यक्ति होंगे, जिन्हें पद छोडऩे के बाद भी जीवन भर सुरक्षा मिलेगी, जबकि प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री, खुफिया एजेंसी के निदेशक या सेना प्रमुख को भी यह सुविधा नहीं मिलती है। उन्होंने इस कदम के पीछे के तर्क पर सवाल उठाते हुए इसे सरकार की मंशा पर चिंताजनक बताया।पायलट ने बताया कि विपक्ष चुनावी संस्थाओं से जुड़े इन अहम मुद्दों पर लोगों, विशेषकर युवाओं के बीच जागरूकता बढ़ाने का प्रयास कर रहा है।

उन्होंने कहा कि जिन संस्थाओं से पारदर्शी और स्वतंत्र रूप से काम करने की अपेक्षा की जाती है, उन्हें राजनीतिक विचारधारा और जुड़ावों से ऊपर उठना चाहिए। पायलट ने इन मुद्दों को सार्वजनिक मंच पर उठाने के विपक्ष के फैसला का बचाव करते हुए कहा कि संसद के ठीक से काम न करने और सदस्यों द्वारा उठाए गए सवालों के उचित जवाब न मिलने के कारण यह जरुरी हो गया है। उन्होंने यह भी कहा कि यह लड़ाई पहले से ही कई स्तरों पर लड़ी जा रही है। उनका मानना है कि जनता का संस्थाओं पर भरोसा बना रहना चाहिए, लेकिन जब स्वयं व्यवस्था की निष्पक्षता पर ही प्रश्नचिह्न लगे तो यह विश्वास डगमगा जाता है।

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