नई दिल्ली। नागरिकता तय करने का अधिकार चुनाव आयोग का नहीं है। चुनाव आयोग का अधिकार केवल वोटर लिस्ट के नियंत्रण और देश में चुनाव कराने तक ही है। ये टिप्पणी देश के शीर्ष न्यायालय सुप्रीम कोर्ट ने की है। पश्चिम बंगाल एसआईआर विवाद पर शुक्रवार को सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने दो टूक कहा कि इलेक्शन कमीशन का अधिकार केवल मतदाता सूची के नियंत्रण और पर्यवेक्षण तक सीमित है। इसलिए कानून की स्थिति में कोई भ्रम नहीं है। मामले की अगली सुनवाई 25 अगस्त को होगी।
दरअसल चुनाव आयोग देश में इस वक्त वोटर लिस्ट का स्पेशल रिवीजन करवा रहा है। स्पेशल रिवीजन के दौरान वोटर लिस्ट से नाम हटाए जाने के बाद लोगों ने नागरिकता को लेकर भ्रम की स्थिति बन गई है। मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच गया है। 17 जुलाई को सुनवाई के दौरान शीर्ष न्यायालय ने साफ कहा कि वोटर लिस्ट में नाम नहीं होने से नागरिकता अपने आप खत्म नहीं हो जाती। सीजेआई सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी मोहना की बेंच के सामने याचिकाकर्ता की ओर से वरिष्ठ वकील गोपाल शंकरनारायण ने दलील दी।
अदालत में सुनवाई के दौरान जस्टिस बागची ने कहा कि नागरिकता तय करना निर्वाचन आयोग का संवैधानिक अधिकार नहीं है। आयोग का अधिकार केवल मतदाता सूची के नियंत्रण और पर्यवेक्षण तक सीमित है, इसलिए कानून की स्थिति में कोई भ्रम नहीं है। उन्होंने कहा कि 19 अपीलीय ट्रिब्यूनलों के काम करने के तरीके से व्यावहारिक स्तर पर असंगतियां और देरी पैदा हो रही है। वकील ने कहा कि ट्रिब्यूनलों के कामकाज में बाधाएं हैं और इससे मामलों के निस्तारण पर असर पड़ रहा है।



