नई दिल्ली। ईरान युद्ध के कारण इस समय न केवल पश्चिम एशिया बल्कि पूरी दुनिया में संकट की स्थिति पैदा हो गई है। अमेरिका और इजरायल की ओर से ईरान पर किए गए हमलों के बाद एनर्जी कॉरिडोर के नाम से विख्यात होर्मुज जलडमरूमध्य (स्ट्रेट ऑफ होर्मुज) से तेल और गैस ले जाने वाले जहाजों की आवाजाही बुरी तरह प्रभावित हुई है। इससे भारत सहित कई प्रमुख देशों में ईंधन की आपूर्ति पर सीधा असर पड़ा है। इस ऊर्जा संकट से निपटने के लिए भारत ने होर्मुज स्ट्रेट पर अपनी निर्भरता कम करने के प्रयास तेज कर दिए हैं। इसी कड़ी में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हालिया यूएई दौरे के दौरान देश की ऊर्जा सुरक्षा को लेकर एक ऐतिहासिक करार हुआ है।
अब खाड़ी क्षेत्र में बढ़ते तनाव को देखते हुए भारत ने ओमान से सीधे गहरे समुद्र के रास्ते गैस पाइपलाइन बिछाने की महत्वाकांक्षी योजना पर भी काम तेज कर दिया है। करीब 40,000 करोड़ रुपये की लागत वाली इस डीप-सी गैस पाइपलाइन परियोजना के जरिए ओमान से सीधे भारत तक गैस लाई जाएगी। सरकार जल्द ही सार्वजनिक क्षेत्र की दिग्गज कंपनियों जैसे गेल, इंजीनियर्स इंडिया और इंडियन ऑयल कॉर्पोरेशन को इस प्रोजेक्ट की विस्तृत रिपोर्ट तैयार करने का निर्देश दे सकती है। इस परियोजना को पूरा होने में पांच से सात साल का समय लग सकता है। इन दोनों बड़ी योजनाओं पर अमल होने से भारत में तेल और रसोई गैस की किल्लत हमेशा के लिए खत्म हो जाएगी और वैश्विक कीमतों में उतार-चढ़ाव का देश पर कोई असर नहीं पड़ेगा।
इस नए समझौते के तहत संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) की सरकारी तेल कंपनी अबू धाबी नेशनल ऑयल कंपनी भारत में अपने कच्चे तेल के भंडारण को बढ़ाकर 30 मिलियन बैरल करेगी। यह भारत का एक महत्वपूर्ण सामरिक पेट्रोलियम भंडार (स्ट्रैटजिक रिजर्व) होगा। वर्तमान में भारत के पास विशाखापत्तनम, मंगलूरू और पादुर में कुल 5.3 मिलियन टन का रणनीतिक भंडार है। यूएई के इस कदम से भारत के रिजर्व में चार मिलियन टन से अधिक अतिरिक्त कच्चा तेल जुड़ जाएगा, जो संकट के समय देश के बेहद काम आएगा। इसके साथ ही दोनों देशों के बीच एलपीजी और प्राकृतिक गैस की दीर्घकालिक आपूर्ति को लेकर भी कई महत्वपूर्ण समझौतों पर हस्ताक्षर किए गए हैं।



