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आधार का इस्तेमाल केवल पहचान तक सीमित रहे: सुप्रीम कोर्ट का केंद्र और राज्यों को नोटिस

नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को महत्वपूर्ण जनहित याचिका पर सुनवाई कर केंद्र सरकार, सभी राज्य सरकारों, केंद्रशासित प्रदेशों, भारत के चुनाव आयोग (ईसीआई) और भारतीय विशिष्ट पहचान प्राधिकरण (यूआईडीएआई) को नोटिस भेजा है। याचिका में यह सुनिश्चित करने की मांग की गई है कि आधार का उपयोग केवल पहचान के प्रमाण के रूप में करे, न कि नागरिकता, निवास, पते या जन्मतिथि के सबूत के तौर पर इसका उपयोग किया जाए। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और जस्टिस वी. मोहना की पीठ ने वकील अश्विनी कुमार उपाध्याय द्वारा दायर याचिका पर सहमति जताकर संबंधित पक्षों से जवाब मांगा है।

सुप्रीम कोर्ट में दायर याचिका में बताया गया है कि आधार अधिनियम, 2016 की धारा 9 स्पष्ट रूप से कहती है कि आधार नागरिकता या निवास का प्रमाण नहीं है। यूआईडीएआई के अपने दिशानिर्देश भी स्पष्ट करते हैं कि आधार केवल पहचान का सबूत है, न कि नागरिकता, पते या जन्मतिथि का सबूत है। इसके बावजूद, यह दस्तावेज व्यापक रूप से स्कूल में दाखिले, प्रॉपर्टी के लेनदेन, जन्म प्रमाण पत्र, राशन कार्ड, ड्राइविंग लाइसेंस और नए वोटर रजिस्ट्रेशन (फॉर्म-6) जैसे विभिन्न कार्यों के लिए उम्र, निवास, नागरिकता और पते के सबूत के तौर पर स्वीकार किया हो रहा है। याचिकाकर्ता ने नए वोटर रजिस्ट्रेशन में जन्मतिथि और निवास के लिए आधार के उपयोग को विशेष रूप से चुनौती दी है, इस आधार और जनप्रतिनिधित्व अधिनियम के प्रावधानों के खिलाफ बताया है।

याचिका में तर्क दिया गया है कि आधार नामांकन फ्रेमवर्क के तहत, भारत में करीब 182 दिनों से रह रहे विदेशी नागरिक भी आधार प्राप्त करने के हकदार हैं। आरोप है कि इस ढीले वेरिफिकेशन सिस्टम का फायदा उठाकर कथित घुसपैठिए और अवैध प्रवासी आधार कार्ड पा लेते हैं। वे बाद में इन आधार कार्डों का उपयोग राशन कार्ड, जन्म प्रमाण पत्र, निवास प्रमाण पत्र, ड्राइविंग लाइसेंस और वोटर पहचान पत्र जैसे अन्य महत्वपूर्ण दस्तावेज प्राप्त करने के लिए करते हैं। यह प्रक्रिया आधार अधिनियम के तहत स्थापित पहचान फ्रेमवर्क की विश्वसनीयता को कमजोर करती है और अयोग्य लोगों को सब्सिडी और कल्याणकारी योजनाओं का लाभ उठाने में मदद करती है, जिससे सरकारी संसाधनों का दुरुपयोग होता है और वास्तविक लाभार्थियों को वंचित होना पड़ता है।

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