नई दिल्ली । प्राचीन भारतीय योग परंपरा का महत्वपूर्ण आसन कर्णपीड़ासन है जो मन और शरीर के संतुलन के लिए अत्यंत लाभकारी माना जाता है। यह आसन न केवल शरीर के लचीलेपन को बढ़ाता है, बल्कि नियमित अभ्यास से तंत्रिका तंत्र को शांत करने और मानसिक एकाग्रता को बढ़ाने में भी सहायक सिद्ध होता है। संस्कृत भाषा में कर्णपीड़ासन शब्द तीन भागों से मिलकर बना है: कर्ण जिसका अर्थ कान है, पीड़ा जिसका अर्थ दबाव या खिंचाव है, और आसन जिसका अर्थ मुद्रा है। इस योग मुद्रा में घुटनों को मोड़कर कानों पर हल्का दबाव डाला जाता है, जिससे बाहरी दुनिया के शोरगुल और व्यवधानों से ध्यान हटाकर व्यक्ति अपनी आंतरिक चेतना और एकाग्रता पर केंद्रित हो पाता है।
योग विशेषज्ञ मानते हैं कि यह आसन भीतर की ओर मुड़ने और आत्म-चिंतन के लिए एक आदर्श स्थिति प्रदान करता है। आयुर्वेद और योग परंपरा के अनुसार, कर्णपीड़ासन को हलासन का एक उन्नत रूप माना जाता है। इसे सामान्यतः हलासन और सर्वांगासन जैसे आसनों के बाद किया जाता है, जब शरीर पहले से ही अधिक लचीलापन प्राप्त कर चुका होता है। इस आसन के नियमित अभ्यास से रीढ़ की हड्डी के लचीलेपन में सुधार होता है, जिससे पीठ दर्द जैसी समस्याओं में राहत मिल सकती है। इसके साथ ही, यह पाचन क्रिया को उत्तेजित करने और पेट के अंगों की कार्यप्रणाली को बेहतर बनाने में भी मदद करता है। मानसिक स्तर पर, यह आसन तनाव और चिंता को कम करने, मस्तिष्क को शांत करने और ध्यान केंद्रित करने की क्षमता को बढ़ाने में विशेष रूप से सहायक है। पेट और कमर की मांसपेशियां इस आसन में शरीर के संतुलन को बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।
कर्णपीड़ासन का अभ्यास करने के लिए, सबसे पहले पीठ के बल सीधे लेट जाएं और हथेलियों को जमीन की ओर रखें। एक गहरी सांस लेते हुए, पैरों को धीरे-धीरे ऊपर उठाएं और उन्हें सिर के पीछे ले जाकर हलासन की मुद्रा बनाएं।
इसके बाद, घुटनों को धीरे से मोड़ते हुए, उन्हें कानों के दोनों ओर जमीन पर टिकाने का प्रयास करें। इस स्थिति में आप अपने हाथों को पीठ के सहारे रख सकते हैं या उन्हें जमीन पर सीधा फैला सकते हैं। सामान्य गति से सांस लेते हुए, इस स्थिति में 30 से 60 सेकंड तक बने रहें, और फिर धीरे-धीरे प्रारंभिक स्थिति में लौट आएं। हालांकि, यह आसन कई मायनों में फायदेमंद है, लेकिन गर्दन या रीढ़ की गंभीर चोट, हर्निया, अनियंत्रित उच्च रक्तचाप, ग्लूकोमा या अन्य किसी गंभीर स्वास्थ्य समस्या से पीड़ित लोगों को इसे केवल एक योग्य योग प्रशिक्षक या चिकित्सक की सलाह और मार्गदर्शन में ही करना चाहिए।



