Health News : नियमित योगाभ्यास शरीर को सक्रिय रखने के साथ मन को शांत और एकाग्र बनाने में भी मदद कर सकता है। भारतीय योग परंपरा में योगासन, प्राणायाम और मुद्राओं का विशेष महत्व माना गया है। योग की विभिन्न मुद्राओं में महामुद्रा को हठयोग की महत्वपूर्ण और प्राचीन अभ्यास तकनीकों में शामिल किया जाता है।इसे महान मुद्रा भी कहा जाता है। महामुद्रा में ‘महा’ शब्द संस्कृत से लिया गया है, जिसका अर्थ महान बताया जाता है। योगिक परंपरा में इसे मानसिक एकाग्रता, शरीर में ऊर्जा के संतुलन और आध्यात्मिक साधना से जोड़कर देखा जाता है।
आयुष मंत्रालय और योग परंपराओं के अनुसार, यह एक उन्नत स्तर का अभ्यास है, इसलिए इसे सही विधि और विशेषज्ञ के मार्गदर्शन में करना बेहतर माना जाता है।महामुद्रा के अभ्यास से रीढ़, जांघों के पीछे की मांसपेशियों यानी हैमस्ट्रिंग और पेल्विक क्षेत्र में खिंचाव आता है। इससे शरीर के लचीलेपन और मांसपेशियों की सक्रियता में सुधार हो सकता है। योग परंपरा में इसे पाचन तंत्र के लिए भी उपयोगी माना जाता है। नियमित अभ्यास शरीर की सामान्य सक्रियता और चयापचय को बेहतर रखने में सहायक हो सकता है। कुछ योगिक मान्यताओं के अनुसार महामुद्रा इड़ा, पिंगला और सुषुम्ना नाड़ियों के संतुलन से जुड़ी है।
इसे मानसिक शांति और ध्यान की अवस्था को बेहतर बनाने वाला अभ्यास भी माना जाता है। तनाव कम करने और शरीर-मन के बीच संतुलन बनाने में भी इसके अभ्यास से लाभ मिलने की बात कही जाती है।महामुद्रा को खाली पेट, विशेष रूप से सुबह के समय करना बेहतर माना जाता है। हालांकि यह उन्नत योगाभ्यास है और इसे बिना सही तकनीक जाने करने से परेशानी हो सकती है। उच्च रक्तचाप, ग्लूकोमा, गंभीर हर्निया, गर्भावस्था या मासिक धर्म के दौरान इसके अभ्यास से बचने की सलाह दी जाती है। रीढ़ की हड्डी में गंभीर दर्द या अन्य समस्या होने पर विशेषज्ञ की देखरेख में ही इसका अभ्यास करना चाहिए।



